Tuesday, January 19, 2016

सुखद परिवर्तन - हिन्दू अपनी सोच बदल रहा है

सुखद परिवर्तन - हिन्दू अपनी सोच बदल रहा है

नव भारत टाइम्स की खबर वाकई सुखद पर प्रेश्या मीडिया का जोर हमेशा की तरह अलग ही दृष्टिकोण पर है.
ये वार का प्रतिवार है.

पढ़े ये खबर.........................

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देश की राजधानी के बाहरी इलाके और उत्तराखंड के बॉर्डर तक हिन्दू स्वाभिमान सेना ट्रेनिंग देकर अपनी धर्म सेना के कुनबे को इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ाई छेड़ने के नाम पर बढ़ा रही है। इनका मानना है कि आईएस 2020 तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अपने कब्जे में ले लेगा। हिन्दू स्वाभिमान सेना के नेताओं ने दावा किया कि 15,000 सैनिक पहले से ही अपनी सुरक्षा और आस्था के लिए मरने को तैयार हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक टीम ने एक हफ्ते में इनके चार कैंपों का दौरा किया। ये कैंप सांप्रदायिक रूप से बेहद संवेदनशील पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैले हैं। इस संगठन की लिस्ट में बच्चों को भी शामिल किया गया है। कुछ की तो उम्र महज आठ साल हो रही है। सभी को तलवार और बंदूक चलाने की शिक्षा दी जा रही है। गाजियाबाद जिले के डासना स्थित एक मंदिर में इस संगठन का हेडक्वॉर्टर है और इसके नेता यहीं मिलते हैं। इन नेताओं ने दावा किया कि इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। इनके 50 ट्रेनिंग कैंप हैं जिनमें कुछ गुप्त हैं और अन्य बमहेता, रोरी में चल रहे हैं। यहां खुलेयाम पुरुषों, महिलाओं, लड़के, लड़कियों को ट्रेनिंग दी जा रही है।


मेरठ सिटी में इनके तीन कैंप चल रहे हैं और अकेले मुजफ्फरनगर में इनके पांच कैंप हैं। विश्व हिन्दू परिषद और दुर्गा वाहिनी के अलावा हिन्दू स्वाभिमान के नेता चेतन शर्मा ने टीओआई से कहा, 'हमारे लक्ष्य सरल हैं- युवाओं को पकड़ो। हम पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कम से कम 50 ट्रेनिंग सेंटर चला रहे हैं। हमारे छात्रों की उम्र 8 से 30 साल के बीच की है। हम बच्चों को सीधे तलवार और बंदूक नहीं देते हैं। पहले 6 महीने तक हम इन्हें मानसिक प्रशिक्षण देते हैं। हम इन्हें गीता के छंदों को सिखाते हैं। हिन्दुओं को मौत से डर नहीं लगता क्योंकि वह फिर से जन्म लेता है। यहां बच्चे बहुत निडर हैं।' आठ साल की सीमा कुमारी (बदला हुआ नाम) ने कहा, 'हम युद्ध सीख रहे हैं क्योंकि हमारी माताएं और बहनें संकट में हैं। अपनी सुरक्षा के साथ-साथ मैं उनकी भी रक्षा करूंगी।'

एक 9 साल के बच्चे ने अपनी भावनाओं को बड़ी मजबूती के साथ कहा, 'सरकारें विफल रही हैं इसलिए हम हथियार उठाने पर बेबस हैं। भारत में आतंकियों के हमले के चलते हिन्दू स्वाभिमान को युवाओं के मन को भ्रमित करने का अवसर मिलता है। मोदीनगर के पास रोरी गांव के हिन्दू स्वाभिमान कैंप में भूतपूर्व सैनिक परमिंदर आर्य बच्चों को ट्रेनिंग दे रहे हैं। उन्होंने कहा, 'हमारी ट्रेनिंग सिंपल है। हम भारत में आतंकी गतिविधियों को लेकर बच्चों को बताते हैं। बच्चों के बीच पठानकोट में आतंकी हमले को लेकर खूब चर्चा की गई है।'

परमिंदर आर्य ने कहा, 'वे इस्लामिक कट्टरता का बदसूरत चेहरा दिखा रहे हैं। ये हिन्दुओं के लिए खतरा हैं। आर्मी के दिनों में मैं कश्मीर में पोस्टेड था। आधी इंडियन आर्मी घाटी में तैनात है लेकिन ये अभी तक कश्मीरी पंडितों के पलायन नहीं रोक सके। ये ऐसी कुछ चीजें हैं जिन्हें खुद से ही करना होगा।' ये सारी चीजें प्रशासन की नाक के नीचे घटित हो रही हैं लेकिन मेरठ जोन के आईजी आलोक शर्मा का कहना है कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि इस तरह की ऐक्टिविटी को लेकर उन्हें कोई रिपोर्ट नहीं मिली है। उन्होंने कहा कि वह इस मामले को निश्चित तौर पर देखेंगे।

पूर्व पेशेवर पहलवान और मार्शल आर्टिस्ट अनिल यादव गाजियाबाद के बमहेता में एक अखाड़ा चला रहे हैं। उन्होंने कहा कि काम अभी बंद नहीं होगा चाहे जो हो जाए। उन्होंने कहा कि हमलोग ज्यादातर कैंपों में अखाड़ा चला रहे हैं और यह अवैध नहीं है। अनिल ने कहा, 'हालांकि हमलोग कुछ कैंपों को गोपनीय तरीके से चलाने को प्राथमिकता देते हैं। हम नहीं चाहते कि पुलिस उन्हें बंद कर दे। मेरे स्टूडेंट्स कठोर व्यवस्था का पालन करते हैं। ये सभी मार्शल आर्ट में ट्रेंड हैं। इन्हें बंदूक चलाने की भी ट्रेनिंग दी जाती है। यदि एक बच्चा जानना चाहता है कि बंदूक कैसे चलती है तो हमलोग उसे ट्रेंड करते हैं। 6 महीने के भीतर स्टूडेंट्स की ट्रेनिंग पूरी हो जाती है और वे फिर अपना ट्रेनिंग कैंप शुरू कर देते हैं। दो सालों के भीतर हमलोगों ने 15,000 बच्चों को ट्रेनिंग दी है। कल्पना कीजिए कि पांच सालों के भीतर हम कितना कुछ पा लेंगे।

हिन्दू तपस्वी स्वामी नरसिंघानंद का विचार इनके लिए अहम है। मंदिर के सामने एक बोर्ड लगा है और उस पर लिखा है, 'यह तीर्थ हिन्दुओं का पवित्र स्थल है। मुसलमानों का प्रवेश वर्जित है। आदेश महंत बाबा नरसिंघानंद सरस्वती। एक दीपक त्यागी नाम के शख्स ने बताया, '1995 तक सरस्वती समाजवादी पार्टी के सदस्य थे। वह मुलायम सिंह के बड़े प्रशंसक थे। 20 साल पहले उनके समुदाय की एक महिला ने सेक्स रैकेट के मामले में खुदकुशी की थी। इस वाकये के बाद से इनकी निष्ठा बदली और एक तपस्वी हो गए। आज इनके हीरो वीर सावरकर हैं जिन्होंने 1923 में हिन्दुत्व टर्म को उछाला। अखिल भारत हिन्दू महासभा के नेता कमलेश तिवारी की विवादित टिप्पणी से पश्चिम बंगाल के मालदा में हिंसा भड़क गई थी। तिवारी भी सरस्वती का ही स्टूडेंट रहा है। सरस्वती का मानना है कि उत्तर प्रदेश में दारुल उलूम देवबंद का वैचारिक रूप से इस्लामिक स्टेट की तरह है। आईएस के खिलाफ उनकी लड़ाई शुरू हो गई है।

इस्लामिक स्टेट के प्रति अपनी नफरत को जाहिर करते हुए सरस्वती ने कहा, 'मेरा मानना है कि इस्लामिक स्टेट के अतिवाद का जवाब हिन्दुओं को भी देना चाहिए। आईएसआईएस का जवाब हम एक हिन्दू स्टेट से ही दे सकते हैं। हमलोग चाहते हैं कि उनके खिलाफ अतिवाद के लेवल तक हम भी पहुंचकर आग का जवाब आग से दें। मेरा मतलब यह नहीं है कि हम कोई आर्गेनाइजेशन बनाएं लेकिन हिन्दुओं की मदद हमारी मुख्य चिंता है। हम इसे जल्द ही हासिल करेंगे। हमलोग के पास पिस्टल है और उनके पास रॉकेट लॉन्चर है। हमें अच्छे हथियारों की जरूरत है ताकि हम अपनी आर्मी को अच्छी ट्रेनिंग दे सकें। आईएस इसलिए बड़ा बना क्योंकि लोकल बिजनस नेता इनकी मदद करते हैं। ऐसे में देश भर के हिन्दुओं को भी हमारी मदद करनी चाहिए।

सरस्वती ने कहा, 'हमने जनसपंर्क अभियान शुरू किया है। हर महीने हमलोग दो पंचायतों को संबोधित कर रहे हैं। एक पंचायत में मैंने अपने हिन्दू शेरों से कहा कि आप सब बहादुर बनिए और अपने हथियारों को हमेशा पास में रखिए। मुजफ्फरनंगर दंगों के दौरान हमलोगों ने हिन्दुओं के हथियार उठाने को कहा था। जिन नेताओं ने हिन्दुओं को बचाने का दावा किया वे सब झूठे हैं।' उन्होंने दीवार पर लिखे एक नारे को पढ़कर सुनाया- हिन्दू शेरों, शान से जीना है तो शान से मरना सीखो। मैं अपने लोगों को युद्ध के लिए तैयार कर रहा हूं। आने वाले वक्त में न तो राज्य सरकार और न ही नरेंद्र मोदी सिविल वॉर को रोक पाएंगे। अपने लोगों सुरक्षा के लिए लड़ते हुए मर जाना ज्यादा अच्छा है।

देवबंद पर हिन्दू स्वाभिमान की प्रतिक्रिया के बारे में दारुल उलूम देवंबद के वाइस चांसलर मौलाना अबुल कासिम नोमानी ने कहा, 'हमारा दरवाजा हमेशा खुला रहता है। यहां कोई भी आकर देख सकता है। हमारी सारी चीजें खुली किताबों की तरह हैं।'

http://navbharattimes.indiatimes.com/state/uttar-pradesh/meerut/15000-strong-dharma-sena-in-uttar-pradesh-readies-for-war-with-islamic-state/articleshow/50647423.cms

Sunday, January 17, 2016

खबर मोदी के लिए....ध्यान से पढ़े मोदी ये खबर

खबर मोदी के लिए....ध्यान से पढ़े मोदी ये खबर 
जिनको आप एक् हाथ के कुरान और एक् हाथ में कंप्यूटर देना चाहते है 


'मैं गिड़गिड़ाती रही लेकिन उसने एक नहीं सुनी'
sex-slave-of-isis-tells-her-story-she-was-begging-but-they-didn-t-hear-her-hindi-news
चरमपंथियों ने अगवा कर लिया

http://www.amarujala.com/feature/samachar/international/rest-of-world/sex-slave-of-isis-tells-her-story-she-was-begging-but-they-didn-t-hear-her-hindi-news/


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नादिया मुराद को खुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाले चरमपंथियों ने अगवा कर लिया था। कई महीनों की यौन प्रताड़ना झेलने के बाद वह किसी तरह उनके चंगुल से भागने में सफल रहीं। और अब दुनिया को यजीदियों पर हो रहे जुल्म की कहानियां सुना रही हैं। बीबीसी रेडियो के खास कार्यक्रम आउटलुक के मैथ्यू बैनिस्टर को नादिया ने सुनाई अपनी आपबीती। पढ़िए नादिया की आपबीती उन्हीं की जुबानी।

कथित इस्लामिक स्टेट के चरमपंथियों के आने से पहले मैं अपनी मां और भाई बहनों के साथ उत्तरी इराक के शिंजा के पास कोचू गांव में रहती थी। हमारे गांव में अधिकतर लोग खेती पर निर्भर हैं। मैं तब छठी कक्षा में पढ़ती थी। बीते साल अगस्त में शिंजा पर इस्लामिक स्टेट के हमले के बाद अधिकतर यजीदी परिवार घर छोड़कर चले गए।

हमारे गांव में कोई 1700 लोग रहते थे और सभी लोग शांतिपूर्वक रहते थे। हमें किसी तरह की कोई चेतावनी नहीं मिली थी कि आईएस शिंजा या हमारे गांव पर हमला करने जा रहा है। 3 अगस्त 2014 की बात है, जब आईएस ने यजीदी पर हमला किया। कुछ लोग माउंट शिंजा पर भाग गए, लेकिन हमारा गाँव बहुत दूर था। हम भागकर कहीं नहीं जा सकते थे। हमें 3 से 15 अगस्त तक बंधक बनाए रखा गया।

खबरें आने लगी थीं कि उन्होंने तीन हजार से ज्यादा लोगों का कत्ल कर दिया है और लगभग 5,000 महिलाओं और बच्चों को अपने कब्जे में ले लिया है। तब तक हमें हकीकत का अहसास हो चुका था। इस दौरान चरमपंथी आए और हमारे हथियार कब्जे में ले लिए। हम कुछ नहीं कर सकते थे। हम पूरी तरह घिर चुके थे। हमें चेतावनी दी गई कि हम दो दिन के अंदर अपना धर्म बदल लें।
15 अगस्त को मैं अपने परिवार के साथ थी। हम बहुत डरे हुए थे क्योंकि हमारे सामने जो घटा था, उसे लेकर हम भयभीत थे। उस दिन आईएस के लगभग 1000 लड़ाके गांव में घुसे। वे हमें स्कूल में ले गए। स्कूल दो मंजिला था। पहली मंजिल पर उन्होंने पुरुषों को रखा और दूसरी मंजिल पर महिलाओं और बच्चों को। उन्होंने हमारा सब कुछ छीन लिया। मोबाइल, पर्स, पैसा, जेवर सब कुछ। मर्दों के साथ भी उन्होंने ऐसा ही किया। इसके बाद उनका नेता जोर से चिल्लाया, जो भी इस्लाम धर्म कबूल करना चाहते हैं, कमरा छोड़कर चले जाएं।हम जानते थे कि जो कमरा छोड़कर जाएंगे वो भी मारे जाएंगे। क्योंकि वो नहीं मानते कि यजीदी से इस्लाम कबूलने वाले असली मुसलमान हैं। वो मानते हैं कि यजीदी को इस्लाम कबूल करना चाहिए और फिर मर जाना चाहिए।

महिला होने के नाते हमें यकीन था कि वे हमें नहीं मारेंगे और हमें जिंदा रखेंगे और हमारा इस्तेमाल कुछ और चीजों के लिए करेंगे। जब वो मर्दों को स्कूल से बाहर ले जा रहे थे तो सही-सही तो पता नहीं कि किसके साथ क्या हो रहा था, लेकिन हमें गोलियां चलने की आवाजें आ रही थी। हमें नहीं पता कि कौन मारा जा रहा था। मेरे भाई और दूसरे लोग मारे जा रहे थे। वे नहीं देख रहे थे कि कौन बच्चा है कौन जवान और कौन बूढ़ा। कुछ दूरी से हम देख सकते थे कि वो लोगों को गांव से बाहर ले जा रहे थे।

लड़ाकों ने एक व्यक्ति से एक लड़का छीन लिया, उसे बचाने के लिए नहीं। बाद में उन्होंने उसे स्कूल में छोड़ दिया। उसने हमें बताया कि लड़ाकों ने किसी को नहीं छोड़ा और सभी को मार दिया। जब उन्होंने लोगों को मार दिया तो वे हमें एक दूसरे गांव में ले गए। तब तक रात हो गई थी और उन्होंने हमें वहाँ स्कूल में रखा। उन्होंने हमें तीन ग्रुपों में बांट दिया था। पहले ग्रुप में युवा महिलाएं थी, दूसरे में बच्चे, तीसरे ग्रुप में बाकी महिलाएं।

हर ग्रुप के लिए उनके पास अलग योजना थी। बच्चों को वो प्रशिक्षण शिविर में ले गए। जिन महिलाओं को उन्होंने शादी के लायक नहीं माना उन्हें कत्ल कर दिया, इनमें मेरी मां भी शामिल थी। रात में वो हमें मोसुल ले गए। हमें दूसरे शहर में ले जाने वाले ये वही लोग थे जिन्होंने मेरे भाइयों और मेरी मां को कत्ल किया था। वो हमारा उत्पीड़न और बलात्कार कर रहे थे। मैं कुछ भी सोचने समझने की स्थिति में नहीं थी।

वे हमें मोसुल में इस्लामिक कोर्ट में ले गए। जहाँ उन्होंने हर महिला की तस्वीर ली। मैं वहां महिलाओं की हजारों तस्वीरें देख सकती थी। हर तस्वीर के साथ एक फोन नंबर होता था। ये फोन नंबर उस लड़ाके का होता था जो उसके लिए जिम्मेदार होता था। इस्लामिक स्टेट के हमलों के बाद यजीदी समुदाय के वजूद पर ही खतरा पैदा हो गया है।

तमाम जगह से आईएस लड़ाके इस्लामिक कोर्ट आते और तस्वीरों को देखकर अपने लिए लड़कियां चुनते। इसके बाद पसंद करने वाला लड़ाका उस लड़ाके से मोलभाव करता जो उस लड़की को लेकर आया था। फिर वह चाहे उसे खरीदे, किराए पर दे या अपनी किसी जान-पहचान वाले को तोहफे में दे दे।

पहली रात जब उन्होंने हमें लड़ाकों के पास भेजा। बहुत मोटा लड़ाका था जो मुझे चाहता था, मैं उसे बिल्कुल नहीं चाहती थी। जब हम सेंटर पर गए तो मैं फर्श पर थी, मैंने उस व्यक्ति के पैर देखे। मैं उसके सामने गिड़गिड़ाने लगी कि मैं उसके साथ नहीं जाना चाहती। मैं गिड़गिड़ाती रही, लेकिन मेरी एक नहीं सुनी गई।

एक हफ़्ते बाद मैंने भागने की कोशिश की। वे मुझे कोर्ट में ले गए और सजा के तौर पर छह सुरक्षा गार्डों ने मेरे साथ बलात्कार किया। तीन महीने तक मेरा यौन उत्पीड़न होता रहा। इस इलाके में चारों तरफ आईएस के लड़ाके ही फैले हैं। तो इन महीनों में मुझे भागने का मौका ही नहीं मिला। एक बार मैं एक पुरुष के साथ थी। वो मेरे लिए कुछ कपड़े खरीदना चाहता था, क्योंकि उसका इरादा मुझे बेच देने का था। जब वो दुकान पर गया। मैं घर पर अकेली थी और मैं वहाँ से भाग निकली।

मैं मोसुल की गलियों में भाग रही थी। मैंने एक मुस्लिम परिवार का दरवाजा खटखटाया और उन्हें अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने मेरी मदद की और कुर्दिस्तान की सीमा तक पहुँचाने में मेरी मदद की। शरणार्थी शिविर में किसी ने मेरी आपबीती नहीं पूछी। मैं दुनिया को बताना चाहती थी कि मेरे साथ क्या हुआ और वहाँ महिलाओं के साथ क्या हो रहा है। मेरे पास पासपोर्ट नहीं था, किसी देश की नागरिकता नहीं थी। मैं कई महीनों तक अपने दस्तावेज पाने के लिए इराक में रुकी रही।

उसी वक़्त जर्मन सरकार ने वहाँ के 1000 लोगों की मदद करने का फैसला किया। मैं उन लोगों में से एक थी। फिर अपना इलाज कराने के दौरान एक संगठन ने मुझसे कहा कि मैं संयुक्त राष्ट्र में जाकर आपबीती सुनाऊं। मैं इन कहानियों को सुनाने के लिए दुनिया के किसी भी देश में जाने को तैयार हूँ।

'तीन महीने तक मेरा यौन उत्पीड़न होता रहा'

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