Sunday, January 20, 2013

अगर आप हिन्दू हैं तो आप आतंकवादी हैं



मित्रों, अगर आप हिन्दू हैं तो आप आतंकवादी हैं ...।

कुल मिलाकर शिंदे ने ब्राह्मणों, बनिए,दलितों,वाल्मीकियों,यादवों,जाट,राजपूतों और सिखों सबको आतंकवादी घोषित कर दिया है.. और लड़ते रहो अन्दर अन्दर

अगर RSS आतंकवादी संगठन है तो मैं आतंकवादी हूँ भाई :)

हो गया कांग्रेस का चिंतन शिविर का उद्देश्य पूरा ,, अब इस देश के हिन्दुओं को चिंतन करना ही होगा की कांग्रेस हिन्दुओं को आतंकवादी बता रही है , भगवा आतंकवादी बता रही है ऐसी कोंग्रेस को हिन्दू कब तक अपने सर पर बैठते रहेगे ,,

अपने बाप को माँ को गाली देने वाले का क्या करना है ये किसी से पूछने जाओगे क्या ?? या अपने स्वाभिमान को जगा कर स्वयं जबाब दोगे ??

जागो हिन्दुओं जागो बहुत सो लिए,, अब सेकुलर नहीं सिर्फ सनातनी बन्ने का समय आ गया है ||

हिन्दू अगर अब भी तमाशबीन बनकर बैठा रहा तो वो दिन दूर नहीं जब घर में बैठे लोगो को घर से उठा लिया जाएगा और सीधा आतंकवादी घोषित करके गोली मार दी जायेगी!!

गृहमंत्री को आर .एस .एस और बी .जे . पी के केम्पो में आतंकवादी ट्रेनिंग की जानकारी हे तो
वो इस पद पर बेठ के लहसुन छील रहा हे क्या ?.

और कुछ दिन इंतजार करो एक खनग्र्स्सि कहेगा जो हिन्दू मंदिर में जाता हे वो आंतकवादी हे


जागो .......हिन्दुओ ...............जागो ........


Wednesday, January 16, 2013

रिफाइन तेल बनता कैसे हैं ?


आज से 50 साल पहले तो कोई रिफाइन तेल के बारे में जानता नहीं था, ये पिछले 20 -25 वर्षों से हमारे देश में आया है | कुछ विदेशी कंपनियों और भारतीय कंपनियाँ इस धंधे में लगी हुई हैं | इन्होने चक्कर चलाया और टेलीविजन के माध्यम से जम कर प्रचार किया लेकिन लोगों ने माना नहीं इनकी बात को, तब इन्होने डोक्टरों के माध्यम से कहलवाना शुरू किया | डोक्टरों ने अपने प्रेस्क्रिप्सन में रिफाइन तेल लिखना शुरू किया कि तेल खाना तो सफोला का खाना या सनफ्लावर का खाना, ये नहीं कहते कि तेल, सरसों का खाओ या मूंगफली का खाओ, अब क्यों, आप सब समझदार हैं समझ सकते हैं |


ये रिफाइन तेल बनता कैसे हैं ? मैंने देखा है और आप भी कभी देख लें तो बात समझ जायेंगे | किसी भी तेल को रिफाइन करने में 6 से 7 केमिकल का प्रयोग किया जाता है और डबल रिफाइन करने में ये संख्या 12 -13 हो जाती है | ये सब केमिकल मनुष्य के द्वारा बनाये हुए हैं प्रयोगशाला में, भगवान का बनाया हुआ एक भी केमिकल इस्तेमाल नहीं होता, भगवान का बनाया मतलब प्रकृति का दिया हुआ जिसे हम ओरगेनिक कहते हैं | तेल को साफ़ करने के लिए जितने केमिकल इस्तेमाल किये जाते हैं सब Inorganic हैं और Inorganic केमिकल ही दुनिया में जहर बनाते हैं और उनका combination जहर के तरफ ही ले जाता है | इसलिए रिफाइन तेल, डबल रिफाइन तेल गलती से भी न खाएं | फिर आप कहेंगे कि, क्या खाएं ? तो आप शुद्ध तेल खाइए, सरसों का, मूंगफली का, तीसी का, या नारियल का | अब आप कहेंगे कि शुद्ध तेल में बास बहुत आती है और दूसरा कि शुद्ध तेल बहुत चिपचिपा होता है | हमलोगों ने जब शुद्ध तेल पर काम किया या एक तरह से कहे कि रिसर्च किया तो हमें पता चला कि तेल का चिपचिपापन उसका सबसे महत्वपूर्ण घटक है | तेल में से जैसे ही चिपचिपापन निकाला जाता है तो पता चला कि ये तो तेल ही नहीं रहा, फिर हमने देखा कि तेल में जो बास आ रही है वो उसका प्रोटीन कंटेंट है, शुद्ध तेल में प्रोटीन बहुत है, दालों में ईश्वर का दिया हुआ प्रोटीन सबसे ज्यादा है, दालों के बाद जो सबसे ज्यादा प्रोटीन है वो तेलों में ही है, तो तेलों में जो बास आप पाते हैं वो उसका Organic content है प्रोटीन के लिए | 4 -5 तरह के प्रोटीन हैं सभी तेलों में, आप जैसे ही तेल की बास निकालेंगे उसका प्रोटीन वाला घटक गायब हो जाता है और चिपचिपापन निकाल दिया तो उसका Fatty Acid गायब | अब ये दोनों ही चीजें निकल गयी तो वो तेल नहीं पानी है, जहर मिला हुआ पानी | और ऐसे रिफाइन तेल के खाने से कई प्रकार की बीमारियाँ होती हैं, घुटने दुखना, कमर दुखना, हड्डियों में दर्द, ये तो छोटी बीमारियाँ हैं, सबसे खतरनाक बीमारी है, हृदयघात (Heart Attack), पैरालिसिस, ब्रेन का डैमेज हो जाना, आदि, आदि | जिन-जिन घरों में पुरे मनोयोग से रिफाइन तेल खाया जाता है उन्ही घरों में ये समस्या आप पाएंगे, अभी तो मैंने देखा है कि जिनके यहाँ रिफाइन तेल इस्तेमाल हो रहा है उन्ही के यहाँ Heart Blockage और Heart Attack की समस्याएं हो रही है |


जब हमने सफोला का तेल लेबोरेटरी में टेस्ट किया, सूरजमुखी का तेल, अलग-अलग ब्रांड का टेस्ट किया तो AIIMS के भी कई डोक्टरों की रूचि इसमें पैदा हुई तो उन्होंने भी इसपर काम किया और उन डोक्टरों ने जो कुछ भी बताया उसको मैं एक लाइन में बताता हूँ क्योंकि वो रिपोर्ट काफी मोटी है और सब का जिक्र करना मुश्किल है, उन्होंने कहा "तेल में से जैसे ही आप चिपचिपापन निकालेंगे, बास को निकालेंगे तो वो तेल ही नहीं रहता, तेल के सारे महत्वपूर्ण घटक निकल जाते हैं और डबल रिफाइन में कुछ भी नहीं रहता, वो छूँछ बच जाता है, और उसी को हम खा रहे हैं तो तेल के माध्यम से जो कुछ पौष्टिकता हमें मिलनी चाहिए वो मिल नहीं रहा है |" आप बोलेंगे कि तेल के माध्यम से हमें क्या मिल रहा ? मैं बता दूँ कि हमको शुद्ध तेल से मिलता है HDL (High Density Lipoprotin), ये तेलों से ही आता है हमारे शरीर में, वैसे तो ये लीवर में बनता है लेकिन शुद्ध तेल खाएं तब | तो आप शुद्ध तेल खाएं तो आपका HDL अच्छा रहेगा और जीवन भर ह्रदय रोगों की सम्भावना से आप दूर रहेंगे |


अभी भारत के बाजार में सबसे ज्यादा विदेशी तेल बिक रहा है | मलेशिया नामक एक छोटा सा देश है हमारे पड़ोस में, वहां का एक तेल है जिसे पामोलिन तेल कहा जाता है, हम उसे पाम तेल के नाम से जानते हैं, वो अभी भारत के बाजार में सबसे ज्यादा बिक रहा है, एक-दो टन नहीं, लाखो-करोड़ों टन भारत आ रहा है और अन्य तेलों में मिलावट कर के भारत के बाजार में बेचा जा रहा है | 7 -8 वर्ष पहले भारत में ऐसा कानून था कि पाम तेल किसी दुसरे तेल में मिला के नहीं बेचा जा सकता था लेकिन GATT समझौता और WTO के दबाव में अब कानून ऐसा है कि पाम तेल किसी भी तेल में मिला के बेचा जा सकता है | भारत के बाजार से आप किसी भी नाम का डब्बा बंद तेल ले आइये, रिफाइन तेल और डबल रिफाइन तेल के नाम से जो भी तेल बाजार में मिल रहा है वो पामोलिन तेल है | और जो पाम तेल खायेगा, मैं स्टाम्प पेपर पर लिख कर देने को तैयार हूँ कि वो ह्रदय सम्बन्धी बिमारियों से मरेगा | क्योंकि पाम तेल के बारे में सारी दुनिया के रिसर्च बताते हैं कि पाम तेल में सबसे ज्यादा ट्रांस-फैट है और ट्रांस-फैट वो फैट हैं जो शरीर में कभी dissolve नहीं होते हैं, किसी भी तापमान पर dissolve नहीं होते और ट्रांस फैट जब शरीर में dissolve नहीं होता है तो वो बढ़ता जाता है और तभी हृदयघात होता है, ब्रेन हैमरेज होता है और आदमी पैरालिसिस का शिकार होता है, डाईबिटिज होता है, ब्लड प्रेशर की शिकायत होती है |

Tuesday, January 15, 2013

सम्राट विक्रमादित्य का साम्राज्य अरब तक था

सम्राट विक्रमादित्य का साम्राज्य अरब तक था.

शकों को भारत से खदेड़ने के बाद सम्राट विक्रमादित्य ने पुरे भारतवर्ष में ही नही , बल्कि लगभग पूरे विश्व को जीत कर हिंदू संस्कृति का प्रचार पूरे विश्व में किया। सम्राट के साम्राज्य में कभी सूर्य अस्त नही होता था। सम्राट विक्रमादित्य ने अरबों पर शासन किया था, इसका प्रमाण स्वं अरबी काव्य में है । "सैरुअल ओकुल" नमक एक अरबी काव्य , जिसके लेखक "जिरहम विन्तोई" नमक एक अरबी कवि है। उन्होंने लिखा है,-------
"वे अत्यन्त भाग्यशाली लोग है, जो सम्राट विक्रमादित्य के शासन काल में जन्मे। अपनी प्रजा के कल्याण में रत वह एक कर्ताव्यनिष्ट , दयालु, एवं सचरित्र राजा था।"
"किंतु उस समय खुदा को भूले हुए हम अरब इंद्रिय विषय -वासनाओं में डूबे हुए थे । हम लोगो में षड़यंत्र और अत्याचार प्रचलित था। हमारे देश को अज्ञान के अन्धकार ने ग्रसित कर रखा था। सारा देश ऐसे घोर अंधकार से आच्छादित था जैसा की अमावस्या की रात्रि को होता है। किंतु शिक्षा का वर्तमान उषाकाल एवं सुखद सूर्य प्रकाश उस सचरित्र सम्राट विक्रम की कृपालुता का परिणाम है। यद्यपि हम विदेशी ही थे,फ़िर भी वह हमारे प्रति उपेछा न बरत पाया। जिसने हमे अपनी द्रष्टि से ओझल नही किया"। "उसने अपना पवित्र धर्म हम लोगो में फैलाया। उसने अपने देश से विद्वान् लोग भेजे,जिनकी प्रतिभा सूर्य के प्रकाश के समान हमारे देश में चमकी । वे विद्वान और दूर द्रष्टा लोग ,जिनकी दयालुता व कृपा से हम एक बार फ़िर खुदा के अस्तित्व को अनुभव करने लगे। उसके पवित्र अस्तित्व से परिचित किए गए,और सत्य के मार्ग पर चलाए गए। उनका यहाँ पर्दापण महाराजा विक्रमादित्य के आदेश पर हुआ। "
इसी काव्य के कुछ अंश बिड़ला मन्दिर,दिल्ली की यज्ञशाला के स्तभों पर उत्कीर्ण है,-------------------१-हे भारत की पुन्य भूमि!तू धन्य है क्योंकि इश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझको चुना। २-वाह्ह ईश्वर का ज्ञान जो सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है,यह भारतवर्ष में ऋषियो द्बारा चारों रूप में प्रकट हुआ। ३-और परमात्मा समस्त संसार को आज्ञा देता है की वेड जो मेरे गान है उनके अनुसार आचरण करो। वह ज्ञान के भण्डार 'साम' व 'यजुर 'है। ४ -और दो उनमे से 'ऋग् ' व 'अथर्व 'है । जो इनके प्रकाश में आ गया वह कभी अन्धकार को प्राप्त नही होता।
सम्राट विक्र्मदियता के काल में भारत विज्ञान, कला, साहित्य, गणित, नस्छ्त्र आदि विद्याओं का विश्व गुरु था। महान गणितग्य व ज्योतिर्विद्ति वराह मिहिर ने सम्राट विक्रम के शासन काल में ही सारे विश्व में भारत की कीर्ति पताका फहराई थी।
एक मित्र की टिपण्णी के द्वारा पता चला है कि सम्राट विक्रम ने रोम के शासक जुलियस सीजर को भी हराकर उसे बंदी बनाकर उज्जेन की सड़कों पर घुमाया था.
टिपण्णी यह है कि ----------------------
कालिदास-ज्योतिर्विदाभरण-अध्याय२२-ग्रन्थाध्यायनिरूपणम्-
श्लोकैश्चतुर्दशशतै सजिनैर्मयैव ज्योतिर्विदाभरणकाव्यविधा नमेतत् ॥ᅠ२२.६ᅠ॥
विक्रमार्कवर्णनम्-वर्षे श्रुतिस्मृतिविचारविवेकरम्ये श्रीभारते खधृतिसम्मितदेशपीठे।
मत्तोऽधुना कृतिरियं सति मालवेन्द्रे श्रीविक्रमार्कनृपराजवरे समासीत् ॥ᅠ२२.७ᅠ॥
नृपसभायां पण्डितवर्गा-शङ्कु सुवाग्वररुचिर्मणिरङ्गुदत्तो जिष्णुस्त्रिलोचनहरो घटखर्पराख्य।
अन्येऽपि सन्ति कवयोऽमरसिंहपूर्वा यस्यैव विक्रमनृपस्य सभासदोऽमो ॥ᅠ२२.८ᅠ॥
सत्यो वराहमिहिर श्रुतसेननामा श्रीबादरायणमणित्थकुमारसिंहा।
श्रविक्रमार्कंनृपसंसदि सन्ति चैते श्रीकालतन्त्रकवयस्त्वपरे मदाद्या ॥ᅠ२२.९ᅠ॥
नवरत्नानि-धन्वन्तरि क्षपणकामरसिंहशङ्कुर्वेतालभट्टघटखर्परकालिदासा।
ख्यातो वराहमिहिरो नृपते सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य ॥ᅠ२२.१०ᅠ॥
यो रुक्मदेशाधिपतिं शकेश्वरं जित्वा गृहीत्वोज्जयिनीं महाहवे।
आनीय सम्भ्राम्य मुमोच यत्त्वहो स विक्रमार्कः समसह्यविक्रमः ॥ २२.१७ ॥
तस्मिन् सदाविक्रममेदिनीशे विराजमाने समवन्तिकायाम्।
सर्वप्रजामङ्गलसौख्यसम्पद् बभूव सर्वत्र च वेदकर्म ॥ २२.१८ ॥
शङ्क्वादिपण्डितवराः कवयस्त्वनेके ज्योतिर्विदः सभमवंश्च वराहपूर्वाः।
श्रीविक्रमार्कनृपसंसदि मान्यबुद्घिस्तत्राप्यहं नृपसखा किल कालिदासः ॥ २२.१९ ॥
काव्यत्रयं सुमतिकृद्रघुवंशपूर्वं पूर्वं ततो ननु कियच्छ्रुतिकर्मवादः।
ज्योतिर्विदाभरणकालविधानशास्त्रं श्रीकालिदासकवितो हि ततो बभूव ॥ २२.२० ॥
वर्षैः सिन्धुरदर्शनाम्बरगुणै(३०६८)र्याते कलौ सम्मिते, मासे माधवसंज्ञिके च विहितो ग्रन्थक्रियोपक्रमः।
नानाकालविधानशास्त्रगदितज्ञानं विलोक्यादरा-दूर्जे ग्रन्थसमाप्तिरत्र विहिता ज्योतिर्विदां प्रीतये ॥ २२.२१ ॥
ज्योतिर्विदाभरण की रचना ३०६८ कलि वर्ष (विक्रम संवत् २४) या ईसा पूर्व ३३ में हुयी। विक्रम सम्वत् के प्रभाव से उसके १० पूर्ण वर्ष के पौष मास से जुलिअस सीजर द्वारा कैलेण्डर आरम्भ हुआ, यद्यपि उसे ७ दिन पूर्व आरम्भ करने का आदेश था। विक्रमादित्य ने रोम के इस शककर्त्ता को बन्दी बनाकर उज्जैन में भी घुमाया था (७८ इसा पूर्व में) तथा बाद में छोड़ दिया।। इसे रोमन लेखकों ने बहुत घुमा फिराकर जलदस्युओं द्वारा अपहरण बताया है तथा उसमें भी सीजर का गौरव दिखाया है कि वह अपना अपहरण मूल्य बढ़ाना चाहता था। इसी प्रकार सिकन्दर की पोरस (पुरु वंशी राजा) द्वारा पराजय को भी ग्रीक लेखकों ने उसकी जीत बताकर उसे क्षमादान के रूप में दिखाया है।
Gaius Julius Caesar (13 July 100 BC – 15 March 44 BC) --- In 78 BC, --- On the way across the Aegean Sea, Caesar was kidnapped by pirates and held prisoner. He maintained an attitude of superiority throughout his captivity. When the pirates thought to demand a ransom of twenty talents of silver, he insisted they ask for fifty. After the ransom was paid, Caesar raised a fleet, pursued and captured the pirates, and imprisoned them. He had them crucified on his own authority.
Quoted from History of the Calendar, by M.N. Saha and N. C. Lahiri (part C of the Report of The Calendar Reforms Committee under Prof. M. N. Saha with Sri N.C. Lahiri as secretary in November 1952-Published by Council of Scientific & Industrial Research, Rafi Marg, New Delhi-110001, 1955, Second Edition 1992.
Page, 168-last para-“Caesar wanted to start the new year on the 25th December, the winter solstice day. But people resisted that choice because a new moon was due on January 1, 45 BC. And some people considered that the new moon was lucky. Caesar had to go along with them in their desire to start the new reckoning on a traditional lunar landmark.”
ज्योतिर्विदाभरण की कहानी ठीक होने के कई अन्य प्रमाण हैं-सिकन्दर के बाद सेल्युकस्, एण्टिओकस् आदि ने मध्य एसिआ में अपना प्रभाव बढ़ाने की बहुत कोशिश की, पर सीजर के बन्दी होने के बाद रोमन लोग भारत ही नहीं, इरान, इराक तथा अरब देशों का भी नाम लेने का साहस नहीं किये। केवल सीरिया तथा मिस्र का ही उल्लेख कर संतुष्ट हो गये। यहां तक कि सीरिया से पूर्व के किसी राजा के नाम का उल्लेख भी नहीं है। बाइबिल में लिखा है कि उनके जन्म के समय मगध के २ ज्योतिषी गये थे जिन्होंने ईसा के महापुरुष होने की भविष्यवाणी की थी। सीजर के राज्य में भी विक्रमादित्य के ज्योतिषियों की बात प्रामाणिक मानी गयी


ईसा से कई शताब्दी पूर्व भारत भूमि पर एक साम्रराज्य था मालव गण। मालव गण की राजधानी थी भारत की प्रसिद्ध नगरी उज्जेन । उज्जैन एक प्राचीन गणतंत्र राज्य था । प्रजावात्सल्या राजा नाबोवाहन की म्रत्यु के पश्चात उनके पुत्र गंधर्वसेन ने "महाराजाधिराज मालवाधिपति"की उपाधि धारण करके मालव गण को राजतन्त्र में बदल दिया । उस समय भारत में चार शक शासको का राज्य था। शक राजाओं के भ्रष्ट आचरणों की चर्चाएँ सुनकर गंधर्वसेन भी कामुक व निरंकुश हो गया। एकं बार मालव गण की राजधानी में एक जैन साध्वी पधारी।उनके रूप की सुन्दरता की चर्चा के कारण गंधर्व सेन भी उनके दर्शन करने पहुच गया । साध्वी के रूप ने उन्हें कामांध बना दिया। महाराज ने साध्वी का अपहरण कर लिया तथा साध्वी के साथ जबरदस्ती विवाह कर लिया। अपनी बहन साध्वी के अपहरण के बाद उनके भाई जैन मुनि कलिकाचार्य ने राष्ट्र्यद्रोह करके बदले की भावना से शक राजाओं को उज्जैन पर हमला करने के लिए तैयार कर लिया। शक राजाओं ने चारों और से आक्रमण करके उज्जैन नगरी को जीत लिया.शोषद वहाँ का शासक बना दिया गया। गंधर्व सेन साध्वी और अपनी रानी सोम्यादर्शन के साथ विन्धयाचल के वनों में छुप गये.साध्वी सरस्वती ने महारानी सोम्या से बहुत दुलार पाया तथा साध्वी ने भी गंधर्व सेन को अपना पति स्वीकार कर लिया । वनों में निवास करते हुए,सरस्वती ने एक पुत्र को जनम दिया, जिसका नाम भरत हरी रक्खा गया.उसके तीन वर्ष पश्चात महारानी सोम्या ने भी एक पुत्र को जनम दिया.जिसका नाम विक्रम सेन रक्खा गया।

विंध्याचल के वनों में निवास करते हुए एक दिन गंधर्व सेन आखेट को गये,जहाँ वे एक सिंह का शिकार हो गये। वहीं साध्वी सरस्वती भी अपने भाई जैन मुनि कलिकाचार्य के राष्ट्र
द्रोह से छुब्द थी।महाराज की म्रत्यु के पशचात उनहोने भी अपने पुत्र भ्रत्हरी को महारानी को सोंपकर अन्न का त्याग कर दिया।और अपने प्राण त्याग दिए। उसके पश्चात महारानी सोम्या दोनों पुत्रों को लेकर कृषण भगवान् की नगरी चली गई,तथा वहाँ पर आज्ञातवास काटने लगी। दोनों राजकुमारों में भ्रताहरी चिंतन शील बालकथा,तथा विक्रम में एक असाधारण योद्धा के सभी गुन विद्यमान थे। अब समय धीरे धीरे समय अपनी कालपरिक्र्मा पर तेजी से आगे बढने लगा। दोनों राजकुमारों को पता चल चुका था की शको ने उनके पिता को हराकर उज्जैन पर अधिकार कर लिया था,तथा शक दशको से भारतीय जनता पर अत्याचार कर रहे है।विक्रम जब युवा हुआ तब वह एक सुगतित शरीर का स्वामी व एक महान योद्धा बन चुका था। धनुषबाण, खडग, असी,त्रिसूल,व परशु आदि में उसका कोई सानी नही था.अपनी नेत्रत्व्य करने की छमता के कारन उसने एक सैन्य दल भी गठित कर लिया था।

अब समय आ गया था ,की भारतवर्ष को शकों से छुटकारा दिलाया जाय।वीर विक्रम सेन ने अपने मित्रो को संदेश भेजकर बुला लिया.सभाओं व मंत्रणा के दौर शुरू हो गए। निर्णय लिया गया की ,सर्वप्रथम उज्जैन में जमे शक राज शोशाद व उसके भतीजे खारोस को युद्ध में पराजित करना होगा।परन्तु एक अड़चन थीकि, उज्जैन पर आक्रमण के समय सौराष्ट्र का शकराज भुमक व तक्षिला का शकराज कुशुलुक शोशाद की साहयता के लिए आयेंगे। विक्रम ने कहा की, शक राजाओं के पास विशाल सेनाये है,संग्राम भयंकर होगा,तो उसके मित्रो ने उसे आश्वासन दियाकी, जब तक आप उज्जैन नगरी को नही जीत लेंगे ,तब तक सौराष्ट्र व तक्षिला की सेनाओं को हम आप के पास फटकने भी न देंगे। विक्रम सेन के इन मित्रों में सौवीर गन राज्य का युवराज प्रधुम्न, कुनिंद गन राज्य का युवराज भद्रबाहु,अमर्गुप्त आदि प्रमुख थे।

अब सर्वप्रथम सेना की संख्या को बढ़ाना व उसको सुद्रढ़ करना था। सेना की संख्या बढ़ाने के लिए गावं गावं के शिव मंदिरों में भैरव भक्त के नाम से गावों के युवकों को भरती किया जाने लगा। सभी युवकों को त्रिशूल प्रदान किए गए। युवकों को पास के वनों में शास्त्राभ्यास कराया जाने लगा.इस कार्य में वनीय छेत्र बहुत साहयता कर रहा था। इतना बड़ा कार्य होने के बाद भी शकों को कानोकान भनक भी नही लगी.
कुछ ही समय में भैरव सैनिकों की संख्या लगभग ५० सहस्त्र हो गई.भारत वर्ष के वर्तमान की हलचल देखकर भारत का भविष्य अपने सुनहरे वर्तमान की कल्पना करने लगा। लगभग दो वर्ष भाग दौर में बीत गए.इसी बीच विक्रम को एक नया सहयोगी मिल गया अपिलक। अपिलक आन्ध्र के महाराजा शिवमुख का अनुज था। अपिलक को भैरव सेना का सेनापति बना दिया गया। धन की व्यवस्था का भार अमर्गुप्त को सोपा गया। अब जहाँ भारत का भविष्य एक चक्रवाती सम्राट के स्वागत के लिए आतुर था,वहीं चारो शक राजा भारतीय जनता का शोषण कर रहे थे और विलासी जीवन में लिप्त थे।

 इशा की प्रथम शताब्दी में महाकुम्भ के अवसर पर सभी भैरव सेनिको को साधू-संतो के वेश में उज्जैन के सैकडो गावों के मंदिरों में ठहरा दिया गया .प्रय्तेक गाँव का आर मन्दिर मनो शिव के टांडाव् के लिए भूमि तैयार कर रहा था। महाकुम्भ का स्नान समाप्त होते ही सैनिको ने अपना अभियान शुरू कर दिया। भैरव सेना ने उज्जैन व विदिशा को घेर लिया gayaa . भीषण संग्राम हुआ। विदेशी शकों को बुरी तरह काट डाला गया। उज्जैन का शासक शोषद भाग खड़ा हुआ.तथा मथुरा के शासक का पुत्र खारोश विदिशा के युद्ध में मारा गया। इस समाचार को सुनते ही सौराष्ट्र व मथुरा के शासकों ने उज्जैन पर आक्रमण किया। अब विक्रम के मित्रों की बारी थी, उन्होंने सौराष्ट्र के शासक भुमक को भैरव सेना के साथ राह में ही घेर लिया,तथा उसको बुरी तरह पराजित किया, तथा अपने मित्र को दिया वचन पूरा किया।

मथुरा के शक राजा राज्बुल से विक्रम स्वम टकरा गया और उसे बंदी बना लिया। आंध्र महाराज सत्कारणी के अनुज अपिलक के नेत्र्तव्य में पुरे मध्य भारत में भैरव सेना ने अपने तांडव से शक सेनाओं को समाप्त कर दिया। विक्रम सेन ने अपने भ्राता भरथरी को उज्जैन का शासक नियुक्त कराया। तीनो शक राजाओं के पराजित होने के बाद ताछ्शिला के शक रजा कुशुलुक ने भी विक्रम से संधि कर ली। मथुरा के शासक की महारानी ने विक्रम की माता सौम्या से मिलकर छमा मांगी तथा अपनी पुत्री हंसा के लिए विक्रम का हाथ मांगा । महारानी सौम्या ने उस बंधन को तुंरत स्वीकार कर लिया। विक्रम के भ्राता भरथरी का मन शासन से अधिक ध्यान व योग में लगता था इसलिए उन्होंने राजपाट त्याग कर सन्यास ले लिया। उज्जैन नगरी के राजकुमार ने पुन: वर्षों पश्चात गणतंत्र की स्थापना की व्यवस्था की परन्तु मित्रों व जनता के आग्रह पर विक्रम सेन को महाराजाधिराज विक्र्माद्वित्य के नाम से सिंहासन पर आसीत् होना पडा।
लाखों की संख्या में शकों का याघ्होपवीत हुआ। शक हिंदू संस्कृति में ऐसे समां गए जैसे एक नदी समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व खो देती है। विदेशी शकों के aakramano से भारत मुक्त हुआ तथा हिंदू संस्क्रती का प्रसार समस्त विश्व में हुआ। इसी शक विजय के उपरांत इशा से ५७ वर्ष पूर्व महाराजा विक्रमाद्व्टी के राज्याभिषेक पर विक्रमी संवत की स्थापना हुई। आगे आने वाले कई चक्रवाती सम्राटों ने इन्ही सम्राट विक्रमादित्य के नाम की उपाधि धारण की.

भारतवर्ष के ऐसे वीर शिरोमणि सम्राट विकारामाद्वित्य को शत-शत प्रणाम


Sunday, January 13, 2013

राजपूत एवं हुन


राजपूत एवं हुन :


एतिहासिक विषयो की समिक्षा करना एक महान अनुभव है और उसमे भी अगर भारतभूमि के इतिहास की बात आती है तो बात ही कुछ और.

हिंदू इतिहास में अपने पराक्रम,संघर्ष और विजयी शृंखलाओ से अपना एक युग बनानेवाले राजपूत और उनकी उत्पत्ति के विषय में अनेक मत्प्रवाह आते है,खासकर जब राजपूतो के उत्पत्ति के अनुमान में जनरल टोड से लेकर अधिकाँश इतिहासकार राजपूतो को " हुन " लोगो के वंशज मानते है !
उनके इस मत से तो स्वयं हम भी एकमत नहीं परन्तु फिरभी जब हुनो का गहराई से अध्ययन किया तो उनके विषय में थोडा बोहत जनमानस को बताने की इच्छा प्रबल हुयी ,प्रासंगिक हमारी यह पोस्ट -
कौन थे ये "हुन" ? कहासे आये थे ? क्या चाहते थे ?

प्राचीन युग में इसा की तीसरी और चौथी शताब्दी में सम्पूर्ण यूरोप ,चीन और मध्य एशिया में हुन नामकी इस महामारी का प्रकोप छाया हुआ था.
हां ,इसे महामारी ही कहना चाहए ,क्योंकि हुन और उनके आक्रमण होते ही ऐसे थे की जैसे कोई संक्रामक रोग मनुष्य के शारीर को झकझोर के रख दे वैसे ही हुनो के आक्रमण किसी भी राष्ट्र की संस्कृति और समाज का भयानक विध्वंस कर डालते थे .

सिर्फ पुरुष ही नहीं औरतो से लेकर बच्चो तक सारे के सारे घोडो पर सवार और शस्त्र्कुशल हुन चीत्कार करते हुए गावो ,नगरों में हडकंप मचाते थे ,उनका सबसे प्रभावशाली बल था उनकी संख्या . जहा हजारों के आक्रमण की अपेक्षा करो वहा लाखो हुन दिखाई देते .युद्ध के समय आक्रमण करती हुयी हुनो की सेनाए किसी सागर के समान प्रतीत होती .

हुनो से ज्यादा लोगो को हुनो के विध्वंस का डर था क्योंकि अपने जीते हुए प्रदेशो पर वे अनन्वित अत्याचार करते . वहाके धार्मिक स्थल,शालाए घर, गाव ,खेत इनको उजाड़ते हुए अनगिनत लोगो की कत्तल करते हुए उनके कटे हुए सरो में मदिरा भर आर पिटे हुए हुन अपना जयोत्सव मनाया करते थे .इसीलिए उनके आक्रमण के डर से ही कई शक्तिशाली राज्यों की सेनाए पहले ही अपना मनोबल खो देती और परिणामस्वरूप हुनो के ग्रास बनती .

हुनोद्वारा यूरोप और मध्य एशिया का विध्वंश :

वैसे ध्न्यात साधनों से हुनो उगम चीन के आसपास के प्रदेशो के कबीलो में बताया जाता है .चीन के नजदीक होने की वजह से हुनो के आक्रमण चीन पर सबसे पहले होना शुरुवात हुए .जमींन,धन और सत्ता, साम्राज्य की लालस में हुनो ने चीन में रक्त की नदिया बहा डाली उनके इस विद्ध्वंस से तंग आकार चीन के राजा ने अपने प्रदेश की रक्षा हेतु एक बोहत लंबी दिवार बना दी . यही है वो चीन की लंबी दिवार , जो की हुन और उनके आक्रमण के डर एक मूर्तिमंत स्वरुप ही है .

चीन के बाद हुनो की बड़े बड़े ढेर सारे दल मध्य एशिया में छोटे बड़े देशो में उत्पात मचाने लगे उन्ही में से कुछ दलों को संघटित करके हुनो के "अतीला" नामक सेनापति ने यूरोप की तरफ आक्रमण किया ,जिसमे सबसे पहले भक्ष्य बने यूरोपियन रशिया पर अनेक अलग अलग मार्गो से हुनो के झुण्ड के झुण्ड जा टकराए .पाठशालाए ,नगर ,गाव ,चर्च सब जलाकर ख़ाक करती हुयी हुन सेनाए रशिया को टोड मरोडकर पोलैंड पर जा गिरी जहा उस से आगे के ' गाथ ' लोगो का उन्होंने पराजित किया .आगे बलशाली रोमन सैनिको के सेनाओ पर सेनाओ का हुनो ने बुरी तरह से धुवा उडाया .
हुनो के आक्रमणों में पराक्रम से ज्यादा क्रूरता का ही दर्शन होता था जिसके आगे सम्पूर्ण यूरोप पराजित होता चला गया हुनो ने सम्पूर्ण यूरोप को रक्त्स्नान करवा डाला .....

हुनो की इस विध्वंसकारी आक्रमणों की जानकारी गिबन के " dicine and fall of Roman Empire" नामक ग्रन्थ में विस्तृत मिलती है .
आज भी यूरोप किसी गाली देने के लिए हुन इस शब्द का उपयोग किया जाता है जिसका अर्थ होते है - "पिशाच"

इसप्रकार रशिया और यूरोप को चकनाचूर करती हुआ हुनो का सेनासमुद्र आर्यावर्त की और चल पड़ा .
जिसप्रकार यूरोप,चीन और मध्य आशिया का विध्वंस कर डाला ठिक उसी प्रकार भारत को बड़ी आसानी से रुंध डालने की मह्त्वाकंषा से हुन भारत के गांधार प्रदेश पर टूट पड़े .....

.....परन्तु उस समय भरतखंड में शस्त्रों को त्यागकर अपने साम्राज्य को शत्रुओ के हाथो सौप देने वाले ,अहिंसा के मनोरोग से पीड़ित बौद्ध धर्म के अनुयायी सम्राट अशोक का नहीं बल्कि शस्त्रों की देवी माँ चामुंडा की आराधना करने वाले सम्राट विक्रमादित्य के वीर पुत्र सम्राट कुमार गुप्त का शासन था !!
कुमारगुप्त अत्यंत दूरदृष्टि रखने वाला राजा था, विश्व में होते हुनो के उत्पात का प्रकोप एक दीन भारत पर भी होंगा ये उसे ध्न्यात था और इसीलिए अपनी सीमाओ की रक्षा करने के लिए उसने अपने पास विशाल सेना पहले से तैनात रखी थी.

हुनोका भारतपर आक्रमण -

हवा के वेग से हुनो की फौजे चारों दिशाओ से गांधार प्रांत को रोंधते हुए आगे बढ़ी भी नहीं थी की गुप्त साम्राज्य की सीमा पर ही हुन और कुमारगुप्त की सेनाओ में धुमश्च्करी शुरू हो गयी . हुन सेना का आधारस्तंभ उनकी अनगिनत संख्या हुआ करता था ,जिस आधारस्तंभ को गिराने में ज्यादा समय नहीं लगा और शुरुवात के ही कुछ दिनों में कुमारगुप्त की विशाल,अत्याधुनिक शस्त्रों से सुसज्य ,शिस्त्बध्य सेना ने हुनो की सहस्त्रावधि सेना को मार गिराया . कई महीनो तक चले हुए इस युद्ध में भीषण हानि होने के कारण हुन वापस लौर गए और कुमारगुप्त की विजय हुयी .
कुमारगुप्त हाथो मिली करारी मात से हुनो ने आनेवाले ४० साल तक गुप्त साम्राज्य की सीमाओ के आसपास भी कदम नहीं रखा !!
हुनोपर मिली इस जय के लिए कुमारगुप्त ने अपने पुत्र स्कंदगुप्त का गौरव किया और इस विजय के आनंद में एक महान अश्वमेध यग्य का आयोजन हुआ.
इसप्रकार कुमारगुप्त ने हुनो को पराजित किया ,कालांतर से कुमारगुप्त की सन ४५५ में मृत्यु हुयी और उसका पुत्र स्कंदगुप्त समग्र आर्यावर्त के एक्छत्री हिंदू साम्राज्य का सम्राट हुआ !

हुनोका भारतपर पुनः आक्रमण -

ऊपर हमने बताया की हुनो ने उनके देश से बाहर निकल कर आशिया और यूरोप पर धावा बोल दिया था ,जिसमे उनके एक सेनानायक ' आतिला ' के नेतृत्व में उनका एक संघ यूरोप में उत्पात मचा रहा था, ठीक उसी वक्त हुनो की सामूहिक सेना का एक दूसरा संघ मध्य आशिया में अपने सेनानायक ' खिंखिल ' के नेतृत्व में अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहा था .जब हुनो की आर्यावर्त के गांधार प्रांत में बुरी तरह हार हुयी तब उस हार का बदला लेने ३०-४० वर्षों बाद खिंखील ने आर्यावर्त में अपना साम्राज्य करने के उद्देश एक व्यापक आक्रमण किया ,ये घटना समुद्रगुप्त के समारोप्काल की है !

वीर शिरोमणि सम्राट स्कंदगुप्त -

हुनो ने गांधार पंजाब सिंध के सीमावर्ती प्रदेश पर तैनात स्कंदगुप्त के सेना का प्रथम वार में ही धुवा उडाना शुरुवात कर दिया ,इसबार हुन पहले से कई गुना सेना बटोरकर आये थे ,उनका ये दुसरा आक्रमण पहले से कई ज्यादा प्रभावशाली था उसका उचित उत्तर देने और अपनी सेना का मनोबल बढाने वृद्ध सम्राट स्वयं पंजाब प्रांत में अपने सेना के साथ उस का हुनो के विरुद्ध नेतृत्व करने गया ! कुछ महीनो बाद उसे पता भी चला था की उसके सौतेले भाई ने विद्रोह कर दिया है और वो स्वयं सम्राट बन ना चाहता है पर फीरभी समुद्रगुप्त अपना सिंहासन बचाने वापस नहीं गया क्योंकि स्कंदगुप्त के लिए उसके सिंहासन से ज्यादा महत्वपूर्ण हिंदू राष्ट्र की रक्षा थी !! ऐसे ही युद्ध करते करते ,युद्ध शिबिर में ही स्कंदगुप्त की सन ४७१ में मृत्यु हो गयी .

हुनो की विजयी दौड -

स्कंदगुप्त की मृत्यु के बाद उसके नीच सौतेले भाई ने सिंहासन पर अपना अधिकार जमाया .स्त्रियों के संग विलास में डूबे रहनेवाले इस मुर्ख राजा में ना तो युद्ध कौशल्या या राजनीति का ज्ञान था और ना ही धर्मपरायणता और राष्ट्रभक्ति थी . स्कंदगुप्त की मृत्यु के तुरंत बाद इरान के राजा फिरोज को मारकर वहासे लौटी हुयी हुन सेना भारत पर आक्रमण करती हुयी हुन सेना से जा मिली ,अचानक बढे हुए इस सैन्यबल के साथ हुनो ने भारत की सीमाओं को तोड़कर पंजाब,गांधार,सिंध ,कश्मीर को रोंधते हुए मालवा पर कुच किया.सन ५११ में उज्जयिनी नगर के हाथ आते ही भारत के महत्वपूर्ण प्रान्तों पर हुनो का वर्च्स्वा हो गया हुनो की इस विजयी दौड का श्री जाता है उनके कर्तुत्ववान सेनानायक खिंखिल के अनुयायी "तोरमाण" को !

तोरमाण के बाद उसका महत्वाकांशी पुत्र "मिहिरगूल" भारत के हुनो ने जीते हुए प्रदेशो का राजा बना !!

हुनो की वैदिक हिन्दुधर्म के प्रति आसक्ति और हिन्दुधर्म का सामूहिक स्वीकार :

और इस प्रकार पंजाब,गांधार,मालवा आदि प्रदेश पर हुनो का राज चलने लगा .

जबसे हुनो ने भारत में अपने कदम रखे तबसे ही उन्हें यहाके वैदिक हिंदू धर्म के प्रति आसक्ति थी .हुन बौद्ध धर्मियो का द्वेष करते थे उनकी अत्याधिक अहिंसा की उन्हें चिड थी .कालान्तर में हुनो ने हिंदू धर्म का स्वीकार किया ,उसे खुद होकर अपनाया.उनका राजा मिहिरगूल भगवान शिव की कट्टर आराधना करता था .युद्ध की देवता ये उपाधि देकर समूचे हुन भगवान शिव को अपने कुलदेवता मानकर " शैव " बने उन्होंने अनेक मंदिरों का भी निर्माण किया !हुन पहले से ही उग्र स्वभाव के थे हिंदू धर्म को अपनाकर उन्होंने अपने आप को महान समझा और इस भरतखंड के राजा होने का सिर्फ उन्ही को अधिकार है ये कहकर हुन अपना गौरव खुद ही करने लगे

उस समय बौद्ध धर्मियो में राष्ट्र के प्रति उनकी पारम्पारिक द्रोह्भावना तीव्र हो चली थी ठिक उसी वक्त हिंदुत्व और हिंदू देवी देवताओ के प्रति उनकी विरोधी विचारधारा का पता लगते ही उग्र स्वभाव के मिहिरगूल ने बौद्ध स्तूपों को नष्ट करना और बौद्धों के सामूहिक हत्यांसत्र का आरम्भ कर दिया जो की दीर्घकाल तक चलता रहा

मिहिरगूल की उज्जयिनी से पराजय और और कश्मीर तथा पंजाब ,सिंध की और वापसी -

भले ही हिंदुत्व का हुनो को अभिमान हो ,भले ही हिंदूद्रोही बौद्ध सम्रदाय के विरुद्ध हुनो के मन में द्वेष को पर फीरभी हुन थे तो विदेशी ही इसलिए उनके विरुद्ध मालवा के ही एक योद्धा राजा यशोधरमा ने मगध के बालादित्य और कुछ हिंदू राजाओ को एकत्रित कर के मिहिरगूल के विरुद्ध सामूहिक लढाई छेड़ दी ,उज्जैन के निकट मंदसौर में हुनो की पराजय हुयी ,मीहीरगूल स्वयं पकड़ा गया परन्तु उसकी शिव भक्ति के कारण उसे ना मारते हुए यशोधर्मा ने छोड़ दिया !
वहासे मिहिरगुल कश्मीर के पास के जीते हुए हुन्प्रदेश में गया जहा उसने फीरसे अपनी सेना का संचय किया बादमे कश्मीर ,पंजाब और गांधार प्रान्तों में बसकर उसने अपना शेष जीवन काटा ! अपने सम्पूर्ण जीवन में मिहिरगुल ने उसके अधिकार क्षेत्रो में आनेवाले सभी बौद्ध स्तूपों को जमीनदोस्त करते हुए लाखो बौद्धों का वध कर डाला !

दीर्घकाल तक राज करने के बाद मिहिरगुल की जब बुढापे से मृत्यु हुई तब बौद्ध धर्मियोने अपने धर्मग्रंथो में उसे राक्षस की उपाधि देते हुए उसकी मृत्यु को 'बौद्ध धर्म का श्राप " कहकर उस से इस प्रकार बदला लिया (अहिंसा के मनोरोग से पीड़ित बौद्धों से मै ऐसे ही बदले की आशा करता हू )

;;;;;;तो इसप्रकार मिहिरगुल की मृत्यु के बाद हुन पूर्ण रूप से हिन्दुओ में मिल गए ,इस प्रकार समा गए की उन्होंने अपनी पहले की पहचान का कोई चिन्ह नहीं छोड़ा ! उनकी विध्वंसक वृत्ति हिंदू धर्म में आने के बाद अच्छी प्रकार शांत होकर विराश्री में बदल गयी ! उनकी पह्चान इसलिए खत्म हुयी क्योंकि वे स्वयं ही अपने आप को हुन कहलवाना नहीं चाहते थे उन्होंने हिंदू धर्म को न की सिर्फ अपनाया था बल्कि वे उसे अपना अत्याधिक गौरव मान ते थे ! आगे के काल में हुन शैव अर्थात रूद्र देवता के उपासक बनकर प्रसिद्द हुए और हिंदू समाज में इस प्रकार मिश्रित हो गए की उनके स्वतंत्र अस्तित्व कोई पता ना चला !

उसके बाद इसा की छटवी शताब्दी में इतिहास के पटल पर राजस्थान ,पंजाब ,गुजरात ,मालवा(वायव्य और मध्य भारत)राजपूतो का प्रेरणादायी राजनैतिक,भौगोलिक,सामरिक और सांस्कृतिक उथ्थान हुआ' ' ' ' ' 'राजपूत जो की रुद्र्देवता (भगवान शिव,एकलिंग जी) के उपासक थे !!!!


लेखन -
ठाकुर कुलदीप सिंह

Thursday, January 3, 2013

भारत के पिछडेपन का एक महत्वपूर्ण कारण

आज आपके सामने मैँ बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्य रखने जा रहा हू आशा करता हूँ कि आप ध्यान देँगे
ये सभी आँकडे 2012 के हैँ...!!

1. भारत मेँ 33 हजार काँलेज हैँ परन्तु इनमे से एक भी विश्व के 200 मे नहीँ है
2. विश्व शिक्षा सूची मेँ शामिल 181 देशोँ मेँ भारत का स्थान 150 के करीब है
3. गुणवत्ता के हिसाब से 73 देशोँ मेँ 72 वे स्थान पर है
4. बी ए के 10 ग्रेजुएट मेँ से मात्र 1 नौकरी के लायक है
5. बी टेक के 4 ग्रेजुएट मेँ से मात्र 1 नौकरी के लायक है
6. प्रथमिक स्कूलोँ मे 78% बच्चे दाखिला लेते हैँ पर
मात्र 13% उच्च अर्थात 6 कक्षा मेँ दाखिला लेते हैँ
7. भारत के 90% मेँ से 70% विश्व विश्व विद्यालय औसत दर्जे की शिक्षा भी नहीँ दे पा रहे...!!
अब आपको इसके मुख्य कारण बताता हूँ,
1. हमे बचपन से 33%अंक लाने की आदत डाल कर देश मेँ गधे पैदा किये जाते हैँ तथा गरीब को गरीब बना कर रखा जाता है
हालाँकि देश कि जिनके पास हैसियत है वो अपना पेट काट कर अपने बच्चे पब्लिक स्कूलोँ मेँ पढाते पाते हैँ,
2. देश की 75% से ज्यादा आबादी जो 20 रुपये रोज की मोहताज है वो क्या करे?
साथियो मैँ समझता हूँ अब आपको पता चल गया होगा कि आखिर देश मेँ
भुखमरी, बेरोजगारी और भारत के पिछडेपन का एक महत्वपूर्ण कारण पता चल गया होगा...
आप सभी से मेँ निवेदन है कि आप ये बाते अधिक से अधिक लोगोँ तक पहुँचाये
ये देश और हम आपके आभारी रहेँगे...!!

Wednesday, January 2, 2013

भगत सिंह जी के जुटे

द्रोपदी के पांच पति थे या एक: क्या कहती है महाभारत?

द्रोपदी के पांच पति थे या एक: क्या कहती है महाभारत?


द्रोपदी महाभारत की एक आदर्श पात्र है। लेकिन द्रोपदी जैसी विदुषी नारी के साथ हमने बहुत अन्याय किया है। सुनी सुनाई बातों के आधार पर हमने उस पर कई ऐसे लांछन लगाये हैं जिससे वह अत्यंत पथभ्रष्ट और धर्म भ्रष्ट नारी सिद्घ होती है। एक ओर धर्मराज युधिष्ठर जैसा परमज्ञानी उसका पति है, जिसके गुणगान करने में हमने कमी नही छोड़ी। लेकिन द्रोपदी पर अतार्किक आरोप लगाने में भी हम पीछे नही रहे।
draupadiद्रोपदी पर एक आरोप है कि उसके पांच पति थे। हमने यह आरोप महाभारत की साक्षी के आधार पर नही बल्कि सुनी सुनाई कहानियों के आधार पर लगा दिया। बड़ा दु:ख होता है जब कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति भी इस आरोप को अपने लेख में या भाषण में दोहराता है। ऐसे व्यक्ति की बुद्घि पर तरस आता है, और मैं सोचा करता हूं कि ये लोग अध्ययन के अभाव में ऐसा बोल रहे हैं, पर इन्हें यह नही पता कि ये भारतीय संस्कृति का कितना अहित कर रहे हैं।
आईए महाभारत की साक्षियों पर विचार करें! जिससे हमारी शंका का समाधान हो सके कि द्रोपदी के पांच पति थे या एक, और यदि एक था तो फिर वह कौन था?
जिस समय द्रोपदी का स्वयंवर हो रहा था उस समय पांडव अपना वनवास काट रहे थे। ये लोग एक कुम्हार के घर में रह रहे थे और भिक्षाटन के माध्यम से अपना जीवन यापन करते थे, तभी द्रोपदी के स्वयंवर की सूचना उन्हें मिली। स्वयंवर की शर्त को अर्जुन ने पूर्ण किया। स्वयंवर की शर्त पूरी होने पर द्रोपदी को उसके पिता द्रुपद ने पांडवों को भारी मन से सौंप दिया। राजा द्रुपद की इच्छा थी कि उनकी पुत्री का विवाह किसी पांडु पुत्र के साथ हो, क्योंकि उनकी राजा पांडु से गहरी मित्रता रही थी। राजा दु्रपद पंडितों के भेष में छुपे हुए पांडवों को पहचान नही पाए, इसलिए उन्हें यह चिंता सता रही थी कि आज बेटी का विवाह उनकी इच्छा के अनुरूप नही हो पाया। पांडव द्रोपदी के साथ अपनी माता कुंती के पास पहुंच गये।
माता कुंती ने क्या कहा
पांडु पुत्र भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव ने प्रतिदिन की भांति अपनी भिक्षा को लाकर उस सायंकाल में भी अपने ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठर को निवेदन की। तब उदार हृदया कुंती माता द्रोपदी से कहा-’भद्रे! तुम भोजन का प्रथम भाग लेकर उससे बलिवैश्वदेवयज्ञ करो तथा ब्राहमणों को भिक्षा दो। अपने आसपास जो दूसरे मनुष्य आश्रित भाव से रहते हैं उन्हें भी अन्न परोसो। फिर जो शेष बचे उसका आधा हिस्सा भीमसेन के लिए रखो। पुन: शेष के छह भाग करके चार भाईयों के लिए चार भाग पृथक-पृथक रख दो, तत्पश्चात मेरे और अपने लिए भी एक-एक भाग अलग-अलग परोस दो। उनकी माता कहती हैं कि कल्याणि! ये जो गजराज के समान शरीर वाले, हष्ट-पुष्ट गोरे युवक बैठे हैं इनका नाम भीम है, इन्हें अन्न का आधा भाग दे दो क्योंकि यह वीर सदा से ही बहुत खाने वाले हैं।
महाभारत की इस साक्षी से स्पष्ट है कि माता कुंती से पांडवों ने ऐसा नही कहा था कि आज हम तुम्हारे लिए बहुत अच्छी भिक्षा लाए हैं और न ही माता कुंती ने उस भिक्षा को (द्रोपदी को) अनजाने में ही बांट कर खाने की बात कही थी। माता कुंती विदुषी महिला थीं, उन्हें द्रोपदी को अपनी पुत्रवधु के रूप में पाकर पहले ही प्रसन्नता हो चुकी थी।
राजा दु्रपद के पुत्र धृष्टद्युम्न पांडवों के पीछे-पीछे उनका सही ठिकाना जानने और उन्हें सही प्रकार से समझने के लिए भेष बदलकर आ रहे थे, उन्होंने पांडवों की चर्चा सुनी उनका शिष्टाचार देखा। पांडवों के द्वारा दिव्यास्त्रों, रथों, हाथियों, तलवारों, गदाओं और फरसों के विषय में उनका वीरोचित संवाद सुना। जिससे उनका संशय दूर हो गया और वह समझ गये कि ये पांचों लोग पांडव ही हैं इसलिए वह खुशी-खुशी अपने पिता के पास दौड़ लिये। तब उन्होंने अपने पिता से जाकर कहा-’पिताश्री! जिस प्रकार वे युद्घ का वर्णन करते थे उससे यह मान लेने में तनिक भी संदेह रह जाता कि वह लोग क्षत्रिय शिरोमणि हैं। हमने सुना है कि वे कुंती कुमार लाक्षागृह की अग्नि में जलने से बच गये थे। अत: हमारे मन में जो पांडवों से संबंध करने की अभिलाषा थी, निश्चय ही वह सफल हुई जान पड़ती है।
राजकुमार से इस सूचना को पाकर राजा को बहुत प्रसन्नता हुई। तब उन्होंने अपने पुरोहित को पांडवों के पास भेजा कि उनसे यह जानकारी ली जाए कि क्या वह महात्मा पांडु के पुत्र हैं? तब पुरोहित ने जाकर पांडवों से कहा -
‘वरदान पाने के योग्य वीर पुरूषो!
वर देने में समर्थ पांचाल देश के राजा दु्रपद आप लोगों का परिचय जाननाा चाहते हैं। इस वीर पुरूष को लक्ष्यभेद करते देखकर उनके हर्ष की सीमा न रही। राजा दु्रपद की इच्छा थी कि मैं अपनी इस पुत्री का विवाह पांडु कुमार से करूं। उनका कहना है कि यदि मेरा ये मनोरथ पूरा हो जाए तो मैं समझूंगा कि यह मेरे शुभकर्मों का फल प्राप्त हुआ है।
तब पुरोहित से धर्मराज युधिष्ठर ने कहा-पांचाल राज दु्रपद ने यह कन्या अपनी इच्छा से नही दी है, उन्होंने लक्ष्यभेद की शर्त रखकर अपनी पुत्री देने का निश्चय किया था। उस वीर पुरूष ने उसी शर्त को पूर्ण करके यह कन्या प्राप्त की है, परंतु हे ब्राहमण! राजा दु्रपद की जो इच्छा थी वह भी पूर्ण होगी, (युधिष्ठर कह रहे हैं कि द्रोपदी का विवाह उसके पिता की इच्छानुसार पांडु पुत्र से ही होगा) इस राज कन्या को मैं (यानि स्वयं अपने लिए, अर्जुन के लिए नहीं ) सर्वथा ग्रहण करने योग्य एवं उत्तम मानता हूं…पांचाल राज को अपनी पुत्री के लिए पश्चात्ताप करना उचित नही है।
तभी पांचाल राज के पास से एक व्यक्ति आता है, और कहता है-राजभवन में आप लोगों के लिए भोजन तैयार है। तब उन पांडवों को वीरोचित और राजोचित सम्मान देते हुए राजा द्रुपद के राज भवन में ले जाया जाता है।
महाभारत में आता है कि सिंह के समान पराक्रम सूचक चाल ढाल वाले पांडवों को राजभवन में पधारे हुए देखकर राजा दु्रपद, उनके सभी मंत्री, पुत्र, इष्टमित्र आद सबके सब अति प्रसन्न हुए। पांडव सब भोग विलास की सामग्रियाों को छोड़कर पहले वहां गये जहां युद्घ की सामग्रियां रखी गयीं थीं। जिसे देखकर राजा दु्रपद और भी अधिक प्रसन्न हुए, अब उन्हें पूरा विश्वास हो गया कि ये राजकुमार पांडु पुत्र ही हैं।
तब युधिष्ठर ने पांचाल राज से कहा कि राजन! आप प्रसन्न हों क्योंकि आपके मन में जो कामना थी वह पूर्ण हो गयी है। हम क्षत्रिय हैं और महात्मा पांडु के पुत्र हैं। मुझे कुंती का ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठर समझिए तथा ये दोनों भीम और अर्जुन हैं। उधर वे दोनों नकुल और सहदेव हैं।
महाभारतकार का कहना है कि युधिष्ठर के मुंह से ऐसा कथन सुनकर महाराज दु्रपद की आंखों में हर्ष के आंसू छलक पड़े। शत्रु संतापक दु्रपद ने बड़े यत्न से अपने हर्ष के आवेग को रोका, फिर युधिष्ठर को उनके कथन के अनुरूप ही उत्तर दिया। सारी कुशलक्षेम और वारणाव्रत नगर की लाक्षागृह की घटना आदि पर विस्तार से चर्चा की। तब उन्होंने उन्हें अपने भाईयों सहित अपने राजभवन में ही ठहराने का प्रबंध किया। तब पांडव वही रहने लगे। उसके बाद महाराज दु्रपद ने अगले दिन अपने पुत्रों के साथ जाकर युधिष्ठर से कहा-
‘कुरूकुल को आनंदित करने वाले ये महाबाहु अर्जुन आज के पुण्यमय दिवस में मेरी पुत्री का विधि पूर्वक पानी ग्रहण करें तथा अपने कुलोचित मंगलाचार का पालन करना आरंभ कर दें।
तब धर्मात्मा राजा युधिष्ठर ने उनसे कहा-’राजन! विवाह तो मेरा भी करना होगा।
द्रुपद बोले-’हे वीर! तब आप ही विधि पूर्वक मेरी पुत्री का पाणिग्रहण करें। अथवा आप अपने भाईयों में से जिसके साथ चाहें उसी के साथ मेरी पुत्री का विवाह करने की आज्ञा दें।
दु्रपद के ऐसा कहने पर पुरोहित धौम्य ने वेदी पर प्रज्वलित अग्नि की स्थापना करके उसमें मंत्रों की आहुति दी और युधिष्ठर व कृष्णा (द्रोपदी) का विवाह संस्कार संपन्न कराया।
इस मांगलिक कार्यक्रम के संपन्न होने पर द्रोपदी ने सर्वप्रथम अपनी सास कुंती से आशीर्वाद लिया, तब माता कुंती ने कहा-’पुत्री! जैसे इंद्राणी इंद्र में, स्वाहा अग्नि में… भक्ति भाव एवं प्रेम रखती थीं उसी प्रकार तुम भी अपने पति में अनुरक्त रहो।’
इससे सिद्घ है कि द्रोपदी का विवाह अर्जुन से नहीं बल्कि युधिष्ठर से हुआ इस सारी घटना का उल्लेख आदि पर्व में दिया गया है। उस साक्षी पर विश्वास करते हुए हमें इस दुष्प्रचार से बचना चाहिए कि द्रोपदी के पांच पति थे। माता कुंती भी जब द्रोपदी को आशीर्वाद दे रही हैं तो उन्होंने भी कहा है कि तुम अपने पति में अनुरक्त रहो, माता कुंती ने पति शब्द का प्रयोग किया है न कि पतियों का। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि द्रोपदी पांच पतियों की पत्नी नही थी।
माता कुंती आगे कहती हैं कि भद्रे! तुम अनंत सौख्य से संपन्न होकर दीर्घजीवी तथा वीरपुत्रों की जननी बनो। तुम सौभाग्यशालिनी, भोग्य सामग्री से संपन्न, पति के साथ यज्ञ में बैठने वाली तथा पतिव्रता हो।
माता कुंती यहां पर अपनी पुत्रवधू द्रोपदी को पतिव्रता होने का निर्देश भी कर रही हैं। यदि माता कुंती द्रोपदी को पांच पतियों की नारी बनाना चाहतीं तो यहां पर उनका ऐसा उपदेश उसके लिए नही होता।
सुबुद्घ पाठकबृंद! उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि हमने द्रोपदी के साथ अन्याय किया है। यह अन्याय हमसे उन लोगों ने कराया है जो नारी को पुरूष की भोग्या वस्तु मानते हैं, उन लम्पटों ने अपने पाप कर्मों को बचाने व छिपाने के लिए द्रोपदी जैसी नारी पर दोषारोपण किया। इस दोषारोपण से भारतीय संस्कृति का बड़ा अहित हुआ।
ईसाईयों व मुस्लिमों ने हमारी संस्कृति को अपयश का भागी बनाने में कोई कसर नही छोड़ी। जिससे वेदों की पावन संस्कृति अनावश्यक ही बदनाम हुई। आज हमें अपनी संस्कृति के बचाव के लिए इतिहास के सच उजागर करने चाहिए जिससे हम पुन: गौरव पूर्ण अतीत की गौरवमयी गाथा को लिख सकें और दुनिया को ये बता सकें कि क्या थे और कैसे थे?

सँसार के इतने आविष्कारों में आपके देश का क्या योगदान है ?


एक अमेरिकन बोला भाई साहब बताइये अगर आपका भारत महान है तो सँसार के इतने आविष्कारों में आपके देश का क्या योगदान है ??

हिन्दुस्तानी - अरे अमरीकन सुन !!

१. संसार की पहली फायर प्रूफ लेडी भारत में हुई !! नाम था "होलिका" आग में जलती नही थी !! इसीलिए उस वक्त फायर ब्रिगेड चलती नही थी!!

२. संसार की पहली वाटर प्रूफ बिल्डिँग भारत में हुई !! नाम था भगवान विष्णु का"शेषनाग" !! काम तो ऐसे जैसे "विशेषनाग" !!

३. दुनिया के पहले पत्रकार भारत में हुए !! "नारदजी" जो किसी राजव्यवस्था से
नही डरते थे !! तीनों लोक की सनसनी खेज रिपोर्टिँग करते थे !!

४. दुनिया के पहले कॉँमेन्टेटर"संजय" हुये, जिन्होंने नया इतिहास बनाया !!महाभारत के युद्ध का आँखो देखा हाल अँधे "ध्रतराष्ट" को उन्ही ने सुनाया !!

५. दादागिरी करना भी दुनिया हमने सिखाया क्योंकि वर्षो पहले हमारे"शनिदेव" ने ऐसा आतँक मचाया कि "हफ्ता" वसूली का रिवाज उन्ही के शिष्यो ने चलाया !! आज भी उनके शिष्य हर शनिवार को आते है ! उनका फोटो दिखाकर हफ्ता ले जाते है !!

अमेरिकन बोला दोस्त फालतू की बातें मत बनाओ ! कोई ढ़ंग का आविष्कार हो तो बताओ !! जैसे हमने इँसान की किडनी बदल दी, बाईपास सर्जरी कर दी आदि !!

हिन्दुस्तानी बोला रे अमरीकन
सर्जरी का तो आइडिया ही दुनिया को हमने दिया था !! तू ही बता "गणेशजी" का ऑपरेशन क्या तेरे बाप ने किया था !!

अमरीकन हडबडाया !! गुस्से मेँ बडबडाया !! देखते ही देखते चलता फिरता नजर आया !! तब से पूरी दुनिया को हम पर मान है!!! दुनिया में देश कितने ही हो पर सबमें मेरा "भारत" महान है......!!!

Tuesday, January 1, 2013

कांग्रेस का दलाल है द्वारिका पीठ का शकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती


कांग्रेस का दलाल है द्वारिका पीठ का शकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती 

यह वोह  वियक्ति है जिसने कहा था की स्वामी रामदेव को सब कुछ छोड़ कर गंगा बचाने पर ध्यान  देना चाहिए.


ये ही गंगा माँ का हत्यारा है जो  जंतर मंतर पर नौटंकी कर रहा था  |

मित्रों, बहुत पहले उत्तराचंल के लोगो और सुंदर लाल बहुगुणा ने गंगा को बचाने के लिए आंदोलन किया था .. तब ये कांग्रेसी दलाल जो एक तरह से अग्निवेश ही है उसने कांग्रेस की दलाली करके उस आंदोलन को ये कहकर खत्म करवाया की मै गंगा को बचाने के लिए और साधू संतो को जोडूंगा .. लेकिन ये पीठ पीछे कांग्रेस की दलाली करता रहा |

ये वही शंकराचार्य है जिसने सोनिया गाँधी ने हिन्दुओ को गुलाम बनाने का काला कानून का समर्थन किया था .... एक हिंदू संत होते हुए भी ये हिन्दुओ को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने वाले कानून के लिए सोनिया गाँधी को धन्यवाद दिया था |

असल मे कांग्रेस ने इसे हिन्दुओ के खिलाफ एक सेफ्टी वाल्व की तरह रखा है .. और ये हर मसले पर कांग्रेस के लिए दलाली करता है |

ये वही शंकराचार्य है जिसने कदमो पर दिग्विजय सिंह बैठे थे |

मित्रों, ये नरेंद्र मोदी जी के खिलाफ बोलता है .. और उस राजीव गाँधी की प्रशंसा करता है जिसने पांच हज़ार निर्दोष सिक्खो का नरसंहार करवाया |

अब इस नकली शंकराचार्य के चेहरे से नकाब उठ चूका है और उत्तराखंड के लोगो और हरिद्वार के साधू संतो के एलान किया है की इस कांग्रेसी दलाल और गंगा मैया के बलात्कारी स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को उत्तराखंड मे घुसने नही देंगे | और पूरे उत्तराखंड मे जगह जगह इसके पुतले फुके जा रहे है |

श्रीनगर, चंबा, उत्तरकाशी और गोपेश्वर में भी पीएम व शंकराचार्य के पुतले फूंके : श्रीनगर समेत पहाड़ की अन्य पनबिजली परियोजनाओं पर काम रोके जाने के केंद्र सरकार के फैसले से गुस्साए उत्तराखंड जनमंच ने कल नारेबाजी करते हुए प्रदर्शन किया और घंटाघर पर प्रधानमंत्री और शंकराचार्य स्वरुपानंद सरस्वती के पुतले जलाए। जनमंच के आह्वान पर चंबा, उत्तरकाशी, श्रीनगर और गोपेश्वर में भी प्रधानमंत्री और स्वरुपानंद सरस्वती के पुतले जलाए गए। उत्तराखंड जनमंच ने प्रधानमंत्री पर धार्मिक कट्टरपंथियों के सामने आत्मसमर्पण करने का आरोप लगाया है कि उत्तराखंड में बिजली और पानी के संकट के लिए केंद्र सरकार और धार्मिक कट्टरपंथियों की जमात दोषी है।


जनमंच ने ऐलान किया है कि स्वरुपानंद सरस्वती के पहाड़ में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई है। इसे अमली जामा पहनाने के लिए सितंबर के अंतिम सप्ताह में पीपलकोटी में लोक संसद बुलाई जाएगी। जनमंच ने चुनौती दी है कि यदि स्वरुपानंद में हिम्मत हो तो वह सार्वजनिक घोषणा कर पहाड़ में घुसकर देख लें। उत्तराखंड जनमंच ने कहा है कि स्वरुपानंद को वह शंकराचार्य नहीं मानता । जनमंच नेताओं ने कहा कि स्वरुपानंद सरस्वती सिर्फ कांग्रेसी नेता है। लोहारीनाग पाला, पाला मनेरी, भैरोंघाटी, पीपलकोटी और श्रीनगर जल विद्युत परियोजनाओं पर रोक लगाने के केंद्र सरकार के फैसले से नाराज उत्तराखंड जनमंच कार्यकर्ताओं और छात्रों ने आज केंद्र सरकार और शंकराचार्य स्वरुपानंद सरस्वती के खिलाफ जमकर नारेबाजी करते हुए प्रधानमंत्री और शंकराचार्य का पुतला फूंका।

इससे पहले जनमंच कार्यालय पर जमा प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए उत्तराखंड जनमंच के प्रमुख महासचिव राजेन टोडरिया ने प्रधानमंत्री पर धार्मिक कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेकने का आरोप लगाते हुए कहा कि केंद्र सरकार उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों के साथ अन्याय कर रही है। उन्होंने कहा कि इस अन्याय की राजनीतिक कीमत कांग्रेस को चुकानी होगी। जनमंच नेता ने कहा कि टिहरी लोकसभा के उपचुनाव में पहाड़ की जनता कांग्रेस को सबक सिखायेगी। इस मौके पर बोलते हुए जनमंच के उपाध्यक्ष आनंद चंदोला और पीपलकोटी परियोजना बचाओ संघर्ष समिति के महासचिव राजेंद्र हटवाल ने कहा कि उत्तराखंड जनमंच भरत झुनझुनवाला और रवि चोपड़ा जैसे लोग क्षेत्रवादी और पहाड़ विरोधी हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को प्रदेश में रहने की इजाजत नहीं दी जा सकती। प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए डीएवी कालेज छात्रसंघ के महासचिव भगवती प्रसाद मैंदोली ने कहा कि रोजगार देने के बजाय केंद्र सरकार ऐसे हालात पैदा कर रही है जिससे राज्य में बेरोजगारी बढ़ेगी।

उन्होंने कहा कि युवाओं के भविष्य के साथ कोई खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होने कहा कि प्रदेश के छात्र और नौजवान पूरी तरह से उत्तराखंड जनमंच के अभियान के साथ हैं। उन्होंने आगाह किया कि यदि केंद्र ने तत्काल सभी पनबिजली परियोजनाओं पर फिर से काम शुरु कराने का फैसला नहीं किया तो राज्य में व्यापक छात्र आंदोलन छेड़ा जाएगा। उत्तराखंड महिला जनमंच की महानगर अध्यक्ष उर्मिला पंत ने कहा कि अपने बच्चों के रोजगार की रक्षा के लिए उत्तराखंड की महिलायें कोई भी बलिदान देने को तैयार हैं। सभा में जनमंच के प्रदेश उपाध्यक्ष मदन सिंह दानू, मीडिया प्रमुख शिवानंद पांडे, किशन मेहता, छात्र नेता जोगिंद्र रावत, धीरज जोशी, पंकज पटवाल, रवि राणा, सूरज चौहान, अजय बिष्ट, खुशी चांदपुरी, विजय राणा और सचिन थपलियाल, नेत्री उर्मिला पांडे समेत अनेक लोगों ने संबोधित किया।

हिन्दुओ जागो ... और द्वारिका पीठ पर जबरजस्ती कब्जा जमाए इस ढोंगी शंकराचार्य जो कांग्रेस का दलाल है उसे पहचानो - 


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"ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् 
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम् ।उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माम्रतात् ।।

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